Apradh Mukti Vrat Katha

Apradh Mukti Vrat Katha- अपराध मुक्ति व्रत कथा

एक समय की बात है राजा इक्ष्वाकु ने परम श्रद्धेय महर्षि वशिष्ठ जी से प्रश्न किया “हे गुरुदेव! हम लाख चाहने के बावजूद जाने अनजाने अपने जीवन में शताधिक पापकर्म तो अपने सम्पूर्ण जीवन में कर ही लेते हैं। इन अपराधों के कारण मृत्योपरांत हमें और फिर हमारे वंशजों के लिए दुःख का कारण होता है। हे महाप्रभो!

क्या कोई ऐसा व्रत है जिसको करने से सभी प्रकार के पाप मिट जाएं और हमें महाफल की प्राप्ति हो। राज की बातों को सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने कहा, हे राजन्! एक व्रत ऐसा है जिसको विधि पूर्वक करने से शताधिक पापों का शमन होता है। महर्षि ने राजा को शत अपराध बताते हुए कहा कि हे राजन्! शास्त्रों में जो शत अपराध बताये गये हैं

उनके अनुसार चारों आश्रमों में अनासक्ति, नास्तिकता, हवन कर्म का परित्याग, अशच, निर्दयता, लोभवृत्ति, ब्रह्मचर्य का पालन न करना, व्रत का पालन न करना, अन्न दान और आशीष न देना, अमंगल कार्य करना, हिंसा, चोरी, असत्यवादिता, इन्द्रियपरायणता, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, घमंड, प्रमाद, किसी को दुःख पहुंचने वाली बात कहना, शठता, इन्द्रियपरायणता, क्रोध, द्वेष, क्षमाहीनता, कष्ट देना, प्रपंच, वेदों की निंदा करना, नास्तिकता को बढ़ावा देना, माता को कष्ट देना, पुत्र एवं अपने आश्रितों के प्रति कर्तव्य का पालन न करना, अपूज्य की पूजा करना, जप में अविश्वास, पंच यज्ञ का पालन न करना, संध्या-हवन-तर्पण नहीं करना,

ऋतुहीन स्त्री से संसर्ग करना, पर्व आदि में स्त्री संग सहवास करना, परायी स्त्री के प्रति आसक्त होना, वेश्यागमन करना, पिशुनता, अंत्यजसंग, अपात्र को दान देना, माता-पिता की सेवा न करना, पुराणों का अनादर करना, मांस मदिरा का सेवन करना, अकारण किसी से लड़ना, बिना विचारे काम करना, सत्री से द्रोह रखना, कई पत्नी रखना, मन पर काबू न रखना, शास्त्र का पालन न करना, लिया गया धन वापस न करना, गुरु द्वारा दिये गये ज्ञान को भूलना, पत्नी अथवा पुत्र और पुत्री को बेचना, बिलों में पानी डालना, जल क्षेत्र को दूषित करना, वृक्ष काटना, भीख मांगना, स्ववृत्ति का त्याग करना, विद्या बेचना, कुसंगति, गो-वध, स्त्री-हत्या, मित्र-हत्या, भ्रूणहत्या, दूसरे के अन्न मांग कर गुजर करना, विधि का पालन न करना, कर्म से रहित होना,

विद्वान का याचक होना, वाचालता, प्रतिग्रह लेना, संस्कार हीनता, स्वर्ण चोरी करना, ब्रह्मण का अपमान और हत्या करना, गुरू पत्नी से संसर्ग करना, पापियों से सम्बन्ध रखना, कमजोर और मजबूरों की मदद न करना ये सभी शत अपराध के कहे गये हैं।

महर्षि वशिष्ठ ने कहा हे महाबाहो ईक्ष्वाकु इन अपराधो से मुक्ति के लिए भगवान सत्यदेव की पूजा करनी चाहिए। भगवान सत्यदेव अपनी प्रिया लक्ष्मी के साथ सत्यरूप व्रज पर शोभायमान हैं। इनके पूर्व में वामदेव, दक्षिण में नृसिंह, पश्चिम में कपिल, उदर में वराह एवं उरू स्थान में अच्युत भगवान स्थित हैं

जो अपने भक्तों का सदैव कल्याण करते हैं। शंख, चक्र, गदा व पद्म से युक्त भगवान सत्यदेव जिनकी जया, विजया, जयंती, पापनाशिनी, उन्मीलनी, वंजुली, त्रिस्पृशा एवं ववर्धना आठ शक्तियां हैं, जिनके अग्र भाग से गंगा प्रकट हुई है। भक्तवत्सल भगवान सत्यदेव की पूजा मार्गशीर्ष से शुरू करनी चाहिए और प्रत्येक पक्ष की द्वादशी के दिन विधिपूर्वक पूजा करके व्रत करना चाहिए।

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