Komarika Shasti Vrat Katha

शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय को कौमारिकी नाम से जाना जाता है 

इन्हीं के जन्म दिवस पर चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द षष्ठी के नाम से मनाया जाता है. इस व्रत में कार्तिकेय एवं उनकी माता पार्वती की पूजा की जाती है. कौमारिकी षष्ठी व्रत आमतौर पर महिलाएं रखती हैं. इस व्रत के विषय में वाराह पुराण में जिक्र मिलता है. कुमार कार्तिकेय का व्रत होने के कारण इसे स्कंद षष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है

कथा:-

राक्षस राज तारकासुर का अत्याचार बढ़ता जा रहा था. उसने देवलोक पर आक्रमण करके देवराज इन्द्र को पराजित कर दिया. देवतागण अपनी दुर्दशा से काफी दुःखी हुए और ब्रह्मा जी के पास अपनी समस्या लेकर उपस्थित हुए. ब्रह्मा जी ने देवताओं की समस्या को सुनकर काफी विचार किया और कहा कि तारकासुर का अंत केवल शिव पुत्र कर सकता है.

इस उत्तर को सुनकर देवतागण चिंतित हो उठे क्योंकि, शिव सती के वियोग में समाधि लगाए हुए थे. शिव को साधन से जगाना फिर उनका विवाह कराना देवता को असंभव कार्य लग रहा था. देवताओं की परेशानियों को दूर करने के लिए कामदेव ने शिव को समाधि से जगाने का आश्वासन दिया. कामदेव को अपने प्रयास में सफलता मिली और शिव की समाधि टूट गई. कामदेव को इस दुःसाहस के कारण अपना शरीर खोना पड़ा. देवताओं ने जब शिव से तारकासुर के विषय में कहा तब शिव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने देवताओं के कल्याण हेतु दूसरा विवाह करना स्वीकार किया. दूसरी तरफ सती पार्वती रूप में पुनर्जन्म लेकर शिव को पुन: पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी.

शिव ने पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उनसे विवाह कर लिया. चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन शिव और पार्वती के पुत्र के रूप में कुमार कार्तिकेय का जन्म हुआ. कहा जाता है कि कृतिकाओं ने कुमार कार्तिकेय का पालनपोषण किया अत: इनका नाम कार्तिकेय पड़ा. देवताओं ने भगवान शिव से कार्तिकेय को मांगकर उनकी पूजा की और उन्हें अपना सेनापति बनकर तारकासुर की नगरी पर आक्रमण कर दिया. तारकासुर और कुमार कार्तिकेय का युद्ध 6 दिनों तक चलता रहा. इस युद्ध में कार्तिकेय ने अपनी शक्ति के प्रहार से तारकासुर का वध कर दिया. देवताओं को तारकासुर द्वारा हड़प लिया गया स्वर्ग वापस मिल गया.

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