Somvati Amavasya Ki Katha

Somvati Amavasya Ki Katha

 एक साहूकार के सात लडके और एक लड़की थी. उसने सभी लड़कों का विवाह कर दिया था. परन्तु लडकी का अभी विवाह नहीं हुआ था. साहूकार के घर एक साधु प्रतिदिन भिक्षा मांगने आता था. और बदले में आशिर्वाद देकर जाता था. वह साधु जो आशिर्वाद बहुओं को देता था. और जो आशिर्वाद वह साहूकार की बेटी को देता था. उन दोनों में अंतर होता था, बहओं को वह सुहाग का आशिर्वाद देता था, और बेटी को भाईयों से सुख की बात करता था.

एक दिन बेटी ने यह बात अपनी माता से कहीं, मां भी इस बात को जानकार दुःखी हुई. दूसरे दिन उसकी माता ने साधु से पूछा की वे उसकी बेटी को ऎसा आशिर्वाद क्यों देते है. साधु ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया और वे चले गयें. यह देख कर माता की चिन्ता और बढ़ गई. माता ने तुरन्त पण्डित जी को बुलाया और उन्हें अपनी बेटी कि जन्मपत्रिका देखने के लिये कहा. पंण्डित जी ने जन्म पत्रिका देख कर कहा कि उनकी बेटी के भाग्य में विधवा होना लिखा है.

यह बात सुनकार माता को और भी दुःख हुआ, पण्डित जी से उपाय जानने के बाद यह निश्चित हुआ कि सात समुद्र पार एक धोबन के पास जाकर उसकी मांग का सिन्दूर मांगकर अपनी मांग में लगाने से और सोमवती अमावस्या के व्रत करने से यह अशुभ योग भंग हो जायेगा. यह सुनकर माता ने अपने पुत्रों से उसकी बेटी के साथ जाने का आग्रह किया, छोटे पुत्र के अलावा अन्य सभी पुत्रों ने साथ जाने के लिये मना कर दिया. दोनों भाई बहन धोबिन से कहानी सुनने के लिये चल दिये. चलते-चलते दोनों समुद्र किनारे आ गयें. और समुद्र कैसे पार किया जायें,

इसका विचार करने लगें. विचार करने के लिये दोनों जिस पेड़ के नीचे बैठे थे, उस पेड पर एक गिद्ध और गिद्धनी रहती थी. जब भी गिद्वनी के बच्चे होते थे, एक सांप आकर उनके बच्चों को खा जाता था. उस दिन भी ऐसा ही हुआ, गिद्ध-गिद्वनी दोनों बाहर गये हुए थे, कि सांप आया और गिद्धनी के बच्चे चिल्लाने लगें. साहूकार की बेटी समझ गई, उसने साहसे से सांप को मार दिया. सांयकाल में जब गिद्ध और गिद्धनी वापस आयें,

तो उन्होने ने अपने बच्चों को जीवित देख कर खुशी हुई, दोनों ने लड़की को धोबिन के घर ले जाने में सहायता की. लडकी, कई माह तक छुपकर धोबिन की सेवा करती रही. उसकी सेवा से प्रसन्न होकर धोबिन ने अपनी मांग का सिन्दूर उसकी मांग में लगा दिया. इसके बाद व निरजल ही अपने घर की ओर चल दी. रास्ते में पीपल के पेड की परिक्रमा की, और उसके बद जल ग्रहण किया. पीपल के पेड का पूजन करने और सोमवती अमावस्या का व्रत करने से उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई.

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