Sukhi Amavasya Ki Kahani

Sukhi Amavasya Ki Kahani

एक नगरी में एक राजा राज्य करता था। उसकी प्रजा एवं परिवार सब आनन्द से रहते थे। राजा की रानी धार्मिक एवं प्रजा की प्रेमी थी। राजा के महल के सामने एक साहूकार की हवेली थी। राजा की रानी एवं सेठ की पत्नी में मित्रता थी, रानी सारी प्रजा से प्रेम रखती। एक रोज साहुकार की हवेली से साहुकार की पत्नी के रोगने की आवाज आने लगी।

स्त्री भारी विलाप कर रही थी। रानी ने हवेली में रोने की आवाज सुनी तो रानी ने राजा से इस विलाप का कारण पूछा।

राजा ने कहा कि सेठ का पुत्र मर गया है, सो सेठ की पत्नी और लड़के की मां दु:खी है । रानी बहुत भोली थी। उसने राजा को कहा कि महाराज दुःख क्या होता है ?

राजा को समझ नहीं आया की रानी को कैसे समझायें की दुःख क्या होता है ? रानी वापस बोली महाराज दुःख बताओं। जब राजा ने रानी से कहा तुम अपने कुंवर को मार दो तो मालूम हो जायेगा कि दुःख क्या होता है।

महारानी ने अपने कुंवर को महल से नीचे गिरा दिया । भगवान की कृपा से कुंवर गारे के ढेर पर गिरा और उसको खरोंच तक नहीं आई। रानी अपने कुंवर को देखकर नीचे आ रही कि कुंवर को सामने से आते देखा । यह देख राजा भी दंग रह गया कि इतने ऊपर से गिरने के बाद भी कुंवर को कुछ नहीं हुआ । रानी ने राजा से वापस पूछा महाराज दुःख क्या होता है ? बताओ । उस समय पड़ौसी राज्य के राजा के सैनिक युद्ध कर रहे थे, राजा ने रानी से कहा कि अब मैं लड़ाई में अकेला जा रहा हूं | जब तुम मेरे मरने का समाचार सुनोगी तो तुम्हें दु:ख का एहसास हो जायेगा।

राजा ने युद्ध के लिए प्रस्थान किया लेकिन भगवान और अमावस मां की कृपा से लड़ाई जीतकर राजा घर आया । अब राजा को भी आश्चर्य होने लगा कि क्या कारण है उसी समय महारानी महाराज के पास आई और वही प्रश्न दोहराने लगी कि दुःखा के बारे में कैसे एहसास दिलाया जाये।

राजा ने रानी को बुलाकर कहा कि अब हम गंगाजी की यात्रा करने जा रहे हैं वहां गंगा की धारा में कूद जाऊंगा तब तुम्हें दुख का एहसास होगा।

रानी ने गंगा यात्रा की तैयारी की और आवश्यक सामान व रास्ते में भोजन की सामग्री का प्रबन्ध कर यात्रा के प्रस्थान किया । कैलाश पर भगवान शिव ने पार्वती से कहा कि सती आज मैं कलयुग में सुखी आत्मा के दर्शन कराऊंगा।

शिवजी ने बकरे व पार्वती ने बकरी का रूप धारण कर एक बावड़ी के पास घास चरने लगे। इतने में राजा-रानी की सवारी आई। रानी ने सुन्दर छाया और बावड़ी को देखा तो राजा ने कहा हम यहीं थोड़ी देर जलपान व विश्राम करके आगे बढ़ेंगे।

राजा-रानी ने वहा जलपान किया उसके बाद राजा पानी लेने के लिए बावड़ी में गया । उस समय बकरी का रूप धारण किया पार्वती ने बकरे का रूप धारण किये शिवजी से पूछा कि स्वामी इस रानी को दुःख देखा है मगर इसे दुःख क्यों नहीं मिलता है। रानी ने बकरे-बकरी की मनुष्य की भाषा में बोलते देखा उसे गौर से इसने सुख नाम की अमावस का व्रत किया था।

इस जन्म में रानी बनी और सुख का आनन्द ले रही है । सती यह राजा गंगा में भी नहीं मरेगा । रानी ने उसकी बात सुनी।

तभी राजा पानी लेकर आया तो रानी ने राजा को वह सारी घटना सुनाई और वापस अपनी नगरी को चले आये । राजा ने अपनी राज्य में प्रजा को सख अवावस के व्रत करने की आज्ञा दी। राजा हर आवस को अमावस मां की पूजा और कथा करना।

यह व्रत जिस दिन शुक्रवार को अमावस को उसी रोज से प्रारम्भ करें। इक्कीस अमावस तक व्रत करें पहले पांच अमावस गेहूं, लाल कपड़ा दपन करें।

पांच अमावस मूंग, उसके बाद पांच अमावस चना, बाद में पांच अमावस मक्का और अन्त में 21 वें अमावस को चावल यह दान करें।

दान में जैसा रंग अन्न का हो वैसा ही रंग का कपड़ा दक्षिणा दान करें। व्रत के रोज गाय को हरा चारा को ब्राह्मण को भोजन या दक्षिणा देवें जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक व्रत करेगा अमावस माता और भगवान शिव की कृपा से दुःख से मुक्ति प्राप्त करेगा।

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